गजल

” गजल ”
जहर मौत और जिन्दगी भी जहर है
सिसकती है रातें दहकता शहर है |
सदमों का आलम बना हर कही पर
सहम अपने घर में हम करते बसर है ||
ना हम एक होंगे क्यों सय्याद माने
हमी खुद ही खुद के कतरते जो पर है |
हमारी ही करतूत के है खामियाजे
न दहशत हुकूमत पे होता असर है ||
न हिन्दू ना मुश्लिम नही कोई काफिर
ना मजहब है कोई नही उनका घर है |
जमी पर उगाते फसल जो बला की
ना मंदिर ना मस्जीद नही कोई दर है ||
उपाध्याय…

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