गटर

कविता-गटर
—————–
प्यास थी
सरिता की,
पोखर भी,
नसीब ना|
सोचा था,
अपना भी,
विशाल सा,
घर होगा|
रंग बिरंगी,
दुनिया में
प्यारा सा
कुनबा होगा|
चढ़ गिरि से
झाँक रहा,
निर्झर दिख जाए|
रुक रुक उतरा मैं
दौड़ चला सीटी,
देख गटर रोने लगा,
शहर संग-
गटर भी सुखा था|
साथी सब
तितर बितर हो
बिछड़ गये थे,
भटक भटक-
दम तोड़ दिये थे|
दम छूट गया,
गटर किनारे,
जहाँ का पता मिला,
वहां पानी न था|
—————————
***✍ऋषि कुमार “प्रभाकर”——


लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

7 Comments

  1. Satish Pandey - October 13, 2020, 8:08 am

    अति सुंदर अभिव्यक्ति। शुद्ध वर्तनी के साथ सुन्दर प्रस्तुति

  2. Suman Kumari - October 13, 2020, 9:29 am

    सुन्दर

  3. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - October 13, 2020, 9:47 am

    सुंदर

  4. Pragya Shukla - October 13, 2020, 4:27 pm

    बहुत खूब

Leave a Reply