गटर

कविता-गटर
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प्यास थी
सरिता की,
पोखर भी,
नसीब ना|
सोचा था,
अपना भी,
विशाल सा,
घर होगा|
रंग बिरंगी,
दुनिया में
प्यारा सा
कुनबा होगा|
चढ़ गिरि से
झाँक रहा,
निर्झर दिख जाए|
रुक रुक उतरा मैं
दौड़ चला सीटी,
देख गटर रोने लगा,
शहर संग-
गटर भी सुखा था|
साथी सब
तितर बितर हो
बिछड़ गये थे,
भटक भटक-
दम तोड़ दिये थे|
दम छूट गया,
गटर किनारे,
जहाँ का पता मिला,
वहां पानी न था|
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***✍ऋषि कुमार “प्रभाकर”——

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