गलतफहमियों के बीज

गलतफहमियों के बीज अविश्वास से पनपते हैं
अधसुनी बातों को लोग पूरा सच समझते हैं

बड़े तो हो चले हैं हम अपनी नजरों में प्रज्ञा !
ना जाने लोग क्यों मुझे अभी छोटा ही समझते हैं

जीने की उम्मीद खत्म हो चुकी है मगर जिंदा अभी हैं हम
ये बात समझ ना आई! वो मुझे मुर्दा क्यों समझते हैं?

दाग दर्पण में है चेहरे पर मेरे एक भी नहीं
फ़क़त इतनी-सी बात वो क्यों नहीं समझते हैं

उलझे हैं हम या हमारी जुल्फों में कई राज
इस रहस्य के धागे कभी क्यों नहीं सुलझते हैं

सामना कभी तो होगा उनका मेरी वफा(पवित्रता)से
अभी तो दामन को मेरे वो मैला ही समझते हैं

गम छुपाने के लिए हम जो जरा हंस बोल देते हैं
हंसी तो छोड़ो उन्हें मेरे आंसू भी खटकते हैं

जो दो-चार गजलें हम अपनी तन्हाई में लिखते हैं
कुछ नासमझ हैं जो इसको प्रेमपत्र समझते हैं

प्रेमपत्र तो लिखकर प्रेषित किया जाता है
हम तो अपने जज़्बात कविताओं में निचोड़ देते हैं।

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