गाँव की एक रात

काली आधी रात में,
दुनिया देख रही थी सपने |
आलस का आलम था चहु ओर
रात भी लग रही थी ऊंघने |

तब मैंने छत से देखा,
बतखो के झुण्ड को तलाब में |
ठंडी हवा भी चलने लगी,
रात के आखरी पहर मे |

मछलिया खूब उछाल रही थी,
फड़ फाड़ा रही थी इधर उधर |
सोचा हाथ लगाउ उनको,
पर ना जाने गई किधर |

तभी कुछ शोर सुनाई दिया आसमान में,
बागुले उड़ रहे थे एक पंक्ति में |
जैसे वो सब मस्त है आजादी में,
मैंने भी आजादी महसूस की उन सबकी संगति मे |

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6 Comments

  1. महेश गुप्ता जौनपुरी - September 30, 2019, 10:23 pm

    वाह बहुत सुंदर रचना

  2. NIMISHA SINGHAL - October 1, 2019, 7:55 am

    सुंदर

  3. देवेश साखरे 'देव' - October 1, 2019, 1:01 pm

    Bahut khub

  4. Poonam singh - October 1, 2019, 3:29 pm

    Nice

  5. Ishwari Ronjhwal - October 1, 2019, 4:26 pm

    Very gud

  6. nitu kandera - October 4, 2019, 11:02 am

    Beautiful poem

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