“गुरु की महत्ता”

मोड़ दे जो पाणी की लकीरें,
हैं वो गुरू ईश्वरीय वासव अद्भुत महान_
तिमिर भी मयूख हो लेखन करें,
गुरु हैं वो ग्रंथ कगार_
अस्तित्व संपूर्ण परिवर्तित कर दे,
शिष्य बने ज्ञानी हर ग्रंथ में प्रकांड_
किचड़ से कमल सा चुन ले,
हैं वो माली प्रधान_
वसुंधरा भी ऋणी हैं जिसकी,
हैं वो वत्स धरा का प्राण_
प्रकृति भी वंचित नहीं वात्सल्य से जिसके,
हैं वो तेजस्वी मान_
वह वसुंधरा पर ही नहीं व्योम पर भी हैं विख्यात,
द्वारपट खुल जाते हैं ईश्वर के,
वो गुरु हैं अद्भुत ईश्वरीय सँतान_
-PRAGYA-

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