घड़ी

एक छोटी -सी डब्बी में
नाचती हैं सूईयाँ
बेशक बन्द होकर।
पर नचाती है
सारी दुनिया को
अपनी हीं नोंक पर।।
न ठहरती है कभी
न कभी ठहरने देती है।
ये तो घड़ी है ‘विनयचंद ‘
दुनिया को घड़ी बना देती है।।


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4 Comments

  1. Satish Pandey - December 2, 2020, 12:36 pm

    बहुत खूब

  2. Pragya Shukla - December 2, 2020, 9:53 pm

    वाह! बहुत सुंदर

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