घर घर की यही कहानी

दिन रात घर घर की यही कहानी है।
सास बहू के झगड़े युग युगांतर पुरानी है।।
सास की कड़वी – बोली मैं तुमसे कम नहीं कलमुंही।
बहू की कड़वी जबाब – तू ही जहर की पुरिया है।।
सास उठाए झाडू तो बहू उठाए बेलन।
यही दो अस्त्र की चर्चे घर में है आँगन में है।।
यही दकियानूसी विचार हर घर को बर्बाद किया।
नफ़रत की चिंगारी इधर भी है उधर भी है।।
काश !! सास समझ पाती मैं भी कभी बहू थी।
काश !! बहू भी समझ पाती माँ के बदले सासु माँ है।।
बेचारा – पति महोदय भी घबड़ाए अब मैं क्या करुं।
एक तरफ माँ है दूसरी तरफ अर्धांगिनी है।।
कहे कवि – जो पुरूष इन दोनों पे काबू पा लिया।
समझो उसके ही घर में खुशियों के बरसात है।।

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