घास पर बैठकर स्वर्ग पाते थे….

हम समझते थे
इस चमन को अपना सदा
और करते थे प्रीत
इसकी धूल से
गुजारते थे शाम
इसकी गोद में
घास पर बैठकर स्वर्ग पाते थे
मगर हम परदेशी हैं
यह चमन अपना नहीं
हम यहाँ मेहमान थे
ये जहान अपना नहीं
यह जताकर आपने
कर दिया हमको पराया
हम रहे जिस चमन में
उसने नहीं अपना बनाया
जा रहे हम छोंड़कर
यह जहान और यह चमन
जायेगे जहाँ हम
बनायेंगे नया आशियां….

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