चांद से

ऐ चाँद भला क्यों इतरा रहे हो
जल्दी छत पर आओ ना।
भूखी-प्यासी प्यारी मेरी
कब से बाट निहारे आओ ना।।
कितनी सज-धज के आई
अब तो यूँ इतराओ ना।
जल भी है मिष्ठान्न भी है
फल फूलों का भोग लगाओ ना।।


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8 Comments

  1. Geeta kumari - November 4, 2020, 9:05 pm

    वाह, भाई जी बहुत सुंदर कविता

  2. Rishi Kumar - November 4, 2020, 9:28 pm

    लाजवाब✍ 👌👌

  3. Pragya Shukla - November 5, 2020, 12:09 pm

    बहुत खूब

  4. vivek singhal - November 5, 2020, 11:19 pm

    क्या बात है विनय जी !!!

  5. Dhruv kumar - November 8, 2020, 9:48 am

    Wah

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