चादर

कविता- चादर
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रुक रुक सुनले जरा फिर, फिर से मै आता हूँ|
सर सर टप टप आंसू बहता ,
रिम झिम सावन जस होता||
मिल न सके फिर , फिर से कदम,
छोड़ गयी ओ , है एक गम ||

प्यार मिला न उससे हमको,
आज भी हम क्यू रोते है|
शाम शुबह क्यू चेहरा उसका,
आखो मे क्यू सजते है||

फिर क्या होती हालत मेरी,
दर्द को सह सह रोते हैं|
डाट मिला जब जब घर से,
याद में उसके होते हैं|

छिप छिप रोता चादर संग मै,
रोता रहता यारो संग मै|
देख के हालत बोले सब,
रब क्या कर दू इसके संग मै|

माग रहा हूँ तुमसे दुआएँ,
हम सब किससे फरीयाद सुनाएं
आज निभाए यार कि यारी,
सुनले खुदा,हम फरियाद सुनाये|

इतना गहरा दर्द को सहके,
फिर भी भुला नहीं उसको|
जब जब देखा अपनी हालत,
दिआ श्राप नही देख के उसको|

प्यार किया हू हर दर्द सहूगा
तेरे खुशियों खातिर हर धाम चलुगा|
नहीं चाहिए तेरे खुशियों का संदेशा,
तेरे खुशियों के खातिर दुआये कर दूगा|

कभी आई नही मेरे सपनो मे,
यह बात अमल मे लाता हू|
उसके लिए सब कुछ झुठा,
हम बिन याद किये ना सोता हू |रुक रुक……
✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍
कवि -ऋषि कुमार “प्रभाकर ”
पता, ग्राम -पोस्ट खजुरी खुर्द, खजुरी
थाना- तह. कोरांव
जिला-प्रयागराज, पिन कोड 212306

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Responses

  1. ध्वन्यात्मक शब्दों का प्रयोग करके आपने कविता को सजीव बना दिया है बहुत ही उम्दा

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