चार आने की संपत्ति को

कविता-चारआने की संपत्ति को
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चार आने की संपत्ति को
रुपये में खरीदा था
खरीदा उस वक्त मैंने
जब बाजार में भाव गिरा था,
मैं बाजार में
नया खरीददार
बोली लगी, मैं समझ नहीं पाया
सस्ती वस्तु को ,ऊंचे दाम में खरीद लाया,
अब रोता हूं माथा पीट कर
क्रोधित हूं खुद अपनी समझ पर
मंडी में कई खरीददार थे,
सबकी नजर थी वस्तु पर , किसी ने खरीदा नहीं
जितने खरीददार मित्र थे
कमी किसी ने बताई नहीं
अब बदबू से परेशान हूं
मक्खियों से परेशान हूं
परेशान हूं इस बात से
पूंजी गई ,गया समय मेरा
छूट गए ग्राहक मेरे
टूट गए खुद रिश्ते मेरे
संभल जाओ अभी वक्त है
वरना गंदगी के कारण तुम्हारा
प्राण भी रूठ जाएगा
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कवि ऋषि कुमार “प्रभाकर”


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3 Comments

  1. Satish Pandey - January 28, 2021, 11:15 am

    बहुत खूब, अति उत्तम

  2. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - January 28, 2021, 12:38 pm

    अतिसुंदर भाव पूर्ण रचना मगर गूढ़ता लिए

  3. Geeta kumari - January 28, 2021, 4:26 pm

    सोच समझ कर कार्य करने की प्रेरणा देती हुई बहुत ही उम्दा और प्रेरक रचना

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