चाह

जुङे हुये दो बेरंग लब हैं,
इनमें क्यों रंग भरना चाहते हो!!

हर अंग मेरा बेज़ुबान है,
तुम कैसे उन्हें बुलवाना चाहते हो!!

सूखी हुई सी आँखें हैं,
इनमें आँसूं क्यों लाना चाहते हो!!

टूटा हुआ दिल है मेरा,
उसे जोङने की क्यों जुगत लगाते हो!!

अनगिनत ज़ख़्मों से भरी हूँ,
उन पर क्यों मरहम लगाते हो!!

रोम-रोम मेरा दर्द से भरा है,
तुम उनको सुकून पहुँचाना क्यों जारी रखते हो!!

रूह मेरी भटक रही है,
तुम क्योंकर उसे बसाना चाहते हो!!

हर धमनी मेरी सिकुङ रही है,
उनमें रक्त संचरण बेकार ही करना चाहते हो!!

मैं बस एक अचल लाश हूँ,
तुम इस मुर्दे को जिलाना चाहते हो!!

मैं तो एक ख्वाब हूँ,
तुम मुझमें हकीक़त क्या ढूंढ़ते हो!!

मैं ख़ुद ही इक सवाल हूँ,
मुझमें क्यों जवाब तलाशते हो!!

ढीठ सा यूँ ,क्यों मन तुम्हारा है,
अनसुलझे को सुलझाने की, यूँ ज़िद कर बैठे हो!!

दिल तुम्हारा नासमझ बहुत है,
नादान से!ये क्या तुम बेवजह चाह बैठे हो!!

-मधुमिता


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2 Comments

  1. Sridhar - May 28, 2016, 7:24 pm

    very nice

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