चीख

मेरी बेसुध, बेजान
पड़ी रूह
बेआबरू हुआ जिस्म
आज फना हो रहा है
जा रहा है अन्तरिक्ष की
वृहद सैर पर,
जीवन में कुछ लूटेरों
मेरे वजूद को ही मार दिया
मेरे औरत होने पर
एक प्रश्नचिन्ह लगा दिया
धिक्कारती हुई सी चीख निकली
मेरे टूटते जिस्म से,
आवाज रुंध गई जैसे कंठ में
भीग कर
कोयले की कालिख में
मेरा तन
निर्जीव हो गया
जिसने भी सुना मुझे ही
कोसता गया
आज जिन्दगी के मैले बर्तन से
निकल कर,
दुर्गंध छोड़ते समाज के चंगुल से मुक्त हो कर,
जा रही हूँ,
न्याय की आशा नहीं है पर
अभिलाषा लेकर जा रही हूँ।।

Published in हिन्दी-उर्दू कविता

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Responses

  1. नारी के प्रति अपने बहुत ही सुन्दर भाव में कविता को अंजाम दिया है। नारी की अभिलाषा जिस दिन पुरुष समझ जाएगा उस दिन से नारी पर जुल्म होने का अंत भी हो जाएगा

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