चौदहवीं का चाँद

मेरे महबूब के हुस्न की जो बात है।
चौदहवीं के चांद तेरी क्या बिसात है।।

चांद भी देख गश खाएगा,
मेरे महबूब को देख शर्माएगा।
मेरे महबूब से हंसीन ये रात है।
चौदहवीं के चांद तेरी क्या बिसात है।।

ले अंगड़ाई, दिन निकल आए,
खोल दे गेसूं, शाम ढल जाए।
झटक दें जुल्फें तो होती बरसात है।
चौदहवीं के चांद तेरी क्या बिसात है।।

चांद तू क्यों उखड़ा उखड़ा है,
मेरे महबूब की चूड़ी का टुकड़ा है।
खनकती चूड़ियां तो मचलते जज़्बात हैं।
चौदहवीं के चांद तेरी क्या बिसात है।।

देवेश साखरे ‘देव’


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18 Comments

  1. Kumari Raushani - October 21, 2019, 3:26 pm

    लाजवाब

  2. nitu kandera - October 21, 2019, 4:13 pm

    वाह

  3. NIMISHA SINGHAL - October 21, 2019, 4:19 pm

    Khub kha

  4. राम नरेशपुरवाला - October 21, 2019, 4:22 pm

    वाह

  5. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - October 21, 2019, 9:21 pm

    बहुत खूब

  6. Poonam singh - October 21, 2019, 10:23 pm

    Bahut khub

  7. Shyam Kunvar Bharti - October 22, 2019, 4:20 pm

    bahut khub

  8. महेश गुप्ता जौनपुरी - October 25, 2019, 5:16 pm

    वाह बहुत सुंदर

  9. Abhishek kumar - November 25, 2019, 12:13 am

    👏👏👏

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