छोड़कर इन आंसुओं को

छोड़कर इन आंसुओं को,
भाग ना सके।
और थाम भी ना सके।
गिरते रहे उसके बूंदों की तरह,
और मौसम जवां करते रहे।
जमी कुछ पथरा गई थी, इन आंखों की।
बिखरते रहे और इसे संदल करते रहे।


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14 Comments

  1. Priyanka Kohli - September 29, 2020, 12:01 pm

    क्या बात है!❤😍

  2. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - September 29, 2020, 1:11 pm

    अतिसुंदर रचना

  3. मोहन सिंह मानुष - September 29, 2020, 1:18 pm

    बहुत सुंदर पंक्तियां

  4. Deep Patel - September 29, 2020, 8:57 pm

    अतिसुंदर

  5. Anonymous - September 30, 2020, 6:56 pm

    बहोत ही बढ़िया रचना!

  6. Pushpendra Kumar - September 30, 2020, 8:04 pm

    Awesome line

  7. Siya Chauhan - September 30, 2020, 11:58 pm

    Good

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