जख़्म देकर वो मुझसे कहता है…

जख़्म देकर वो मुझसे कहता है
पीर दिल में तो नहीं उठती है ।

आँसू हैं तेरे या पानी हैं
तू उदास क्यों नहीं दिखती है।

तेरे होंठों की जो रंगत है
क्यों मुझे फीकी फीकी लगती है।

तेरी बाँहों में मैं जो आता हूँ
धड़कन क्यों से धड़कती है।

मैं तो तेरा हूँ तू सिर्फ मेरी है
तू मुझे अपना क्यों नहीं समझती है।

अब उस हरजाई’ से कहूँ क्या मैं,
प्रज्ञा शुक्ला’ उसकी बेवफाई को समझती है।

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