“जब तुम नहीं होती”

जब तुम नहीं होती तो ये सब होता है
नींद रूठ जाती है
खिड़की के परदे मुंह फेर लेते हैं
बिस्तर की चादर भी बूढ़ी दिखने लगती है
चेहरे पर सिलवटों से घिरी हुई दादी की तरह
मेरे बेडरूम का सुरीला दरवाजा
डरावनी सी आवाज निकलता है
मेरे गमले का मनी प्लांट
बौना सा लगता है
खिड़की पे कबूतरो का जोड़ा
गुट्टर गूं नहीं करता
छूता हूं बार बार छुई मुई को
पर वो भी संवेदन हीन सा लगता है
मेरी तरह
दीवार में टंगा कैलेंडर
तुम्हारे आने वाले दिन का इंतजार कर रहा है
मेरी तरह
तुम्हारे लौटने के इंतजार में
कांटे जैसा मैं
सूख के फूल सा बन जाता हूं
मेरे साथ ये सब होता है
जब तुम नहीं होती

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