ज़िन्दगी के इस खेल में

तेरी परछाई को देख लेता हूँ
चेहरे को देखने का मौका कहाँ मिलता।
ज़िन्दगी के इस खेल में
दौड़-दौड़ दौड़ लेता हूँ चौका कहाँ मिलता।।


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6 Comments

  1. Satish Pandey - December 18, 2020, 9:26 am

    बहुत बहुत शानदार लिखा है शास्त्री जी, वाह वाह
    तेरी परछाई को देख लेता हूँ
    चेहरे को देखने का मौका कहाँ ,
    काबिलेतारीफ पंक्तियाँ

    • Pt, vinay shastri 'vinaychand' - December 18, 2020, 2:10 pm

      बहुत बहुत धन्यवाद पाण्डेयजी
      अगली पंक्ति पर भी गौर फरमाईए

  2. Pragya Shukla - December 18, 2020, 5:28 pm

    Bahut shaandaaar

  3. Geeta kumari - December 19, 2020, 8:10 am

    बहुत खूब भाई जी लाजवाब अभिव्यक्ति

  4. Sandeep Kala - December 26, 2020, 8:59 pm

    अतिसुंदर

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