ज़िन्दगी मोबाइल की गुलाम हो गई..

ज़िन्दगी “मोबाइल” की गुलाम हो गई ,
“मोबाइल” के संग ही सुबह और शाम हो गई
लिखना हो तो मोबाइल, पढ़ना हो तो मोबाइल,
अब ये बातें तो आम हो गईं
मिलने के भी मोहताज ना रहे ,
“मोबाइल” से ही बातें तमाम हो गई
मोबाइल में मन लगता है सभी का,
आधी ज़िन्दगी इसी के नाम हो गई..

*****✍️गीता*****


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11 Comments

  1. Satish Pandey - October 2, 2020, 10:28 am

    वाह क्या बात है, बहुत ही सुंदर कविता, समसामयिक रचना, जो हो रहा है, उसे प्रकट करती हुई बेहतरीन रचना।

    • Geeta kumari - October 2, 2020, 11:12 am

      आपकी इस बहुमूल्य समीक्षा के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद सतीश जी
      आपका अभिवादन 🙏

  2. Piyush Joshi - October 2, 2020, 10:39 am

    वाह वाह क्या बात है, शानदार कविता

    • Geeta kumari - October 2, 2020, 11:13 am

      बहुत बहुत धन्यवाद आपका पीयूष जी 🙏

  3. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - October 2, 2020, 11:44 am

    वाह वाह बहुत खूब

  4. MS Lohaghat - October 2, 2020, 11:46 am

    बहुत ही बढ़िया, waah waah,

  5. Ramesh Joshi - October 2, 2020, 9:06 pm

    बहुत सुंदर कविता

    • Geeta kumari - October 2, 2020, 9:10 pm

      बहुत बहुत धन्यवाद आपका जोशी जी 🙏

  6. Isha Pandey - October 2, 2020, 9:25 pm

    Very nice गीता जी

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