जाग उठ जा

जाग उठ जा, अब पथिक
पूरा सवेरा हो गया है,
देख ले खिड़की से बाहर
सब अंधेरा खो गया है।
क्या पता क्या थी कशमकश
नभ-धरा के बीच में
रात भर का प्रेम रण वह
ओस बूंदें बो गया है। ।

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Responses

  1. बहुत ही सुन्दर काव्य रचना।
    “क्या पता थी कश्मकश नभ – धरा के बीच में”
    समीक्षा के लिए शब्द कम पड़ रहे हैं सर….
    अद्भुत लेखन। सैल्यूट…

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