जूठे बर्तन हैं नन्हें हाथों में

बाल श्रम पर कविता
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यही तो बात हुई,
कलम,-दवात नहीं,
न उजाला है कहीं,
जूठे बर्तन हैं पड़े,
नन्हें हाथों में मेरे,
यहीं से सच कहूं तो
जिंदगी की मेरी,
सच्ची शुरुआत हुई।
इनमें चिपका हुआ है
जीवन रस,
उसको पा लूँ
उसी से जी जाऊं,
काले कोयले से
इन्हें चमका कर,
अपनी किस्मत को
जरा महका लूँ।
मुझे न देखो
इतने अचरज से,
मेरी मजबूरियां इधर लाई,
ये साधन मिला है
जीना का,
कुछ तो मिला है खाने का,
वरना भूखे थे
कई रोज रहे भूखे ही,
मिल गया जूठी पतीली में
पता जीने का।
—– डॉ0 सतीश चन्द्र पाण्डेय
चम्पावत, उत्तराखंड।


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7 Comments

  1. MS Lohaghat - October 24, 2020, 9:32 am

    बहुत खूब, बहुत बढ़िया

  2. Geeta kumari - October 24, 2020, 12:25 pm

    बाल श्रमिक की मनोदशा का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत किया है कवि सतीश जी ने । पढ़ने लिखने की उम्र में गरीबी से तंग आकर बर्तन साफ करने में ही खाना खाना,जीवन की बुनियादी जरूरत को , तलाश करते बालक की मन: स्थिति की बहुत ही मार्मिक अभिव्यक्ति

  3. Piyush Joshi - October 24, 2020, 1:25 pm

    अतीव सुन्दर कविता

  4. Anu Singla - October 24, 2020, 1:50 pm

    बहुत खूब

  5. Chandra Pandey - October 24, 2020, 1:54 pm

    Very very nice

  6. Rishi Kumar - October 24, 2020, 5:58 pm

    लाजवाब सर ✍👌

  7. Pragya Shukla - October 24, 2020, 9:01 pm

    बालश्रम पर बहुत अच्छी कविता

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