जख़्म

जख़्म तुझको मैं दिखा देता हूँ,
दर्द अपना मैं भुला लेता हूँ।

पास आकर जो बैठ जाते हैं,
उनको अपना मैं बना लेता हूँ।

कहते हैं मुझसे मन की अपनी,
मैं भी मन उनसे लगा लेता हूँ।

करते हैं खुल के बातें मुझसे,
तो खुल के मैं भी सुना लेता हूँ।

हैं नहीं जानते दिल की मेरे,
दिल में जिनको मैं छुपा लेता हूँ।

बैठ ख़ामोशी से देखो मुझको,
आँख परिंदों से मिला लेता हूँ।

घर है ना छत है सर पर मेरे,
राही खुद से ही खफ़ा रहता हूँ।।

राही अंजाना


लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

Related Posts

मुस्कुराना

वह बेटी बन कर आई है

चिंता से चिता तक

उदास खिलौना : बाल कबिता

4 Comments

  1. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - January 23, 2021, 9:36 am

    चलते चलते राहों में
    पड़ गए पांव में छाले।
    देख तेरे महफिल को
    आ ‘ राही’ कुछ गाले।।
    बहुत सुंदर राहीजी
    आप आए महफिल सुहाना हो गया।
    देख आपके जख्मों को
    हर जख्म यहाँ से खो गया।

  2. Satish Pandey - January 24, 2021, 7:54 am

    बहुत सुंदर रचना, वाह

Leave a Reply