झरना

पर्वतों की गोद से निकल,
झरने का जल बह चला।
मिलन करूं मैं धरा से,
यह कह कर चला।
मिलन हुआ धरा से,
पर उस मिलन में,
घना ताप सहकर
जल बना वाष्प,बने मेघ
और बरखा बन बरस गया।
जल पहुंचाया वहां तक मेघों ने,
जहां जन जीवन जल को तरस गया।
सफ़ल हो गया जीवन झरने का,
झर-झर झरते कुछ कर गया।।
_____✍️गीता


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5 Comments

  1. Satish Pandey - February 19, 2021, 8:43 am

    बहुत सुन्दर रचना, लाजवाब अभिव्यक्ति

    • Geeta kumari - February 19, 2021, 12:13 pm

      समीक्षा हेतु बहुत बहुत धन्यवाद सतीश जी

  2. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - February 19, 2021, 5:56 pm

    अतिसुंदर

  3. Rakesh Saxena - February 19, 2021, 11:44 pm

    पर्वतों की गोद से निकल,
    झरने का जल बह चला।
    कहीं किसी की प्यास बुझी,
    कहीं किसी का पाप धुला।।
    वाह 👌 बहुत सुंदर 🙏

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