टूटते क्यों नहीं

टूटते क्यों नहीं
सत्ता के
पाषाण ह्रदय तटबंध
उन आँसुओं के सैलाब से
जो बहते है गुमसुम
बच्चों की खाली थाली देखकर
जब चीख उठते हैं पैरों के
बड़े बड़े लहूलुहान चीरे
फटे कंधे साहस दिलाते
फिर
कल की उम्मीद में सो जाते है
पीकर
उन्हीं अश्रुओं को …


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6 Comments

  1. Satish Pandey - July 31, 2020, 11:20 am

    वाह वाह

  2. Geeta kumari - July 31, 2020, 11:56 am

    Nice poem

  3. मोहन सिंह मानुष - July 31, 2020, 2:47 pm

    गरीब जनता की बेबसी और सत्ता की कुरता को उजागर करती हुई सफल प्रस्तुति 👌

  4. Suman Kumari - July 31, 2020, 3:11 pm

    बहुत ही सुन्दर

  5. Abhishek kumar - July 31, 2020, 8:14 pm

    मनुष्य की बेबसी को उजागर करती हूं सुंदर रचना

  6. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - July 31, 2020, 9:48 pm

    वाह

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