टूटते गुलाब !!

आज तोड़ दी मैंने
पीली पत्तियां पौधों से
उसी तरह जैसे
मैं दिल से बेदखल
हुई थी तुम्हारे !
हरी पत्तियों पर जब पड़ती हैं
ओस की बूंदें
तो तुम्हारे होंठों पर
टूटते गुलाब याद
आते हैं…
हरी-हरी घास को जब
कंघी करती
ये हवाएं हैं तो
याद आ जाता है
वो हसीं लम्हा
जब तुम गेसुओं में मेरी
अपनी उंगलियां फेर देते थे
आज तोड़ दी मैंने वो
पीली पत्तियां पौधों से
अब सिर्फ हरी-भरी पत्तियां ही रह गई हैं !!

Related Articles

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-34

जो तुम चिर प्रतीक्षित  सहचर  मैं ये ज्ञात कराता हूँ, हर्ष  तुम्हे  होगा  निश्चय  ही प्रियकर  बात बताता हूँ। तुमसे  पहले तेरे शत्रु का शीश विच्छेदन कर धड़ से, कटे मुंड अर्पित करता…

प्यार अंधा होता है (Love Is Blind) सत्य पर आधारित Full Story

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ Anu Mehta’s Dairy About me परिचय (Introduction) नमस्‍कार दोस्‍तो, मेरा नाम अनु मेहता है। मैं…

Responses

  1. दिल को छू गई ये पंक्तियां।….. कवियित्री ने बहुत ही नज़ाकत और सुंदरता से अपनी यादों का जिक्र कर दिया।
    अति उच्चस्तरीय लेखन प्रज्ञा,…..keep it up.

  2. वाह, बीती बातों को पीली पत्तियों का उपमान दिया गया है।पीली पत्तियों तो तोड़ना ही ठीक रहता है। ताकि हरे भरे तरीके से आगे बढ़ा जा सके। अतीव सुन्दर लेखनी को सैल्यूट है प्रज्ञा जी।

  3. लक्षणा शब्द शक्ति का बहुत ही सुंदर प्रयोग, सकारात्मकता की तरफ शुरुआत के सुंदर भाव
    बहुत सुंदर कविता

New Report

Close