ठंड बढ़ती जा रही है

ठंड बढ़ती जा रही है
वह सिकुड़ता जा रहा है
रात भर सिकुड़ा हुआ
तन अकड़ता जा रहा है।
सिर व पैरों को मिलाकर
गोल बन सोने लगा,
नींद फिर भी दूर ही थी
क्या करे, रोने लगा।
यूँ तो मौसम सब तरह के
कुछ न कुछ मुश्किल भरे हैं,
ठंड की रातों के पल पल
और भी मुश्किल भरे हैं।
छांव होती गर तुषारापात के
पाले न पड़ता,
काट लेता ठंड के दिन
इस तरह जिंदा न मरता।
पांच रुपये जेब में थे
पेटियां गत्ते की लाया
मानकर डनलप के गद्दे
भूमि पर उनको बिछाया।
क्या कहें ठंडक भी जिद्दी
भेदकर गत्तों का बिस्तर
आ रही थी नोचने तन
बेबस था वह फुटपाथ पर।
—— सतीश चंद्र पाण्डेय


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14 Comments

  1. Piyush Joshi - December 10, 2020, 9:03 am

    बेहतरीन कविता

  2. harish pandey - December 10, 2020, 9:47 am

    बेहतरीन कविता

  3. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - December 10, 2020, 9:52 am

    बेहतरीन

  4. Chandra Pandey - December 10, 2020, 9:55 am

    Very nice lines

  5. Geeta kumari - December 10, 2020, 7:00 pm

    निर्धन की सर्दी का बेहतरीन चित्रण

  6. Praduman Amit - December 10, 2020, 7:14 pm

    ठंड से बच के निकल जाए, जमाने में किसका मजाल है।
    क्या अमीर क्या गरीब सभी को देखिए एक ही हाल है।।

  7. Pragya Shukla - December 11, 2020, 10:54 pm

    सोंचनीय रचना

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