ठिठुरता जीवन…

ठिठुरता जीवन
कांपता है मन
सर्दियों से डरता है ये मन
चिपक रहा
बेटा जब माँ से
कितना बेबस होगा वह तन
हड्डी-हड्डी कांप रही है
रोम-रोम पिघलाता यौवन
कंबल-चादर
फटी पुरानी
सिर ओढ़े तो
खुल जाता है दूजा अंग
शुक्र मनाऊं
जब आये सूरज
धूप देख खिल जाता जीवन….


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8 Comments

  1. Geeta kumari - December 20, 2020, 4:19 pm

    निर्धन की सर्दियों को दर्शाती हुई कवि प्रज्ञा जी मार्मिक अभिव्यक्ति

  2. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - December 20, 2020, 5:58 pm

    अति, अतिसुंदर भाव

  3. Praduman Amit - December 20, 2020, 7:15 pm

    आपने आखिर वास्तविक जीवन से परिचय करवा ही दिया। बहुत ही सुन्दर रचना प्रस्तुत किया है प्रज्ञा जी।

    • Pragya Shukla - December 20, 2020, 8:29 pm

      जी सर, हर कवि की तरह वास्तविकता से परिचय कराना भी मेरा फर्ज है

  4. Satish Pandey - December 20, 2020, 9:08 pm

    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

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