‘तलाशती हूँ मैं जमीं अपनी’

जिम्मेदारी के बोझ तले
दबा रहता है जीवन
जाने किन खयालों में
खोया रहता है जीवन
उठकर तलाशती हूँ मैं जमीं अपनी
आसमां जाने क्या
ढूंढा करता है जीवन…

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Responses

  1. आपकी सोच उच्च कोटि का है। कविता में भाव कूट कूट के भरी पड़ी है।

  2. सर्वश्रेष्ठ कवि बनने पर हार्दिक बधाई
    आप यूं आगे बढ़ती रहें आपकी कविताओं में वाकई में गुणवत्ता और हृदय को छूने वाले भाव होते हैं.
    आप एक ऐसी कवि हैं जो सिर्फ भाव पर नहीं अपितु जानकारियों, शिल्प और संवेदना पर भी ध्यान देती हैं👌👌👌👏👏👏👏👏

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