तसव्वुर तेरी

कम्बख़त तसव्वुर तेरी की जाती नहीं है।
भरी महफिल भी मुझे अब भाती नहीं है।

जिंदगी तो अब बेसुर-ताल सी होने लगी,
नया तराना भी कोई अब गाती नहीं है।

पुकारूं कैसे, अल्फ़ाज़ हलक में घुटने लगे,
सदा भी सुन मेरी तू अब आती नहीं है।

कहकहे नस्तर से दिल में चुभने लगे,
सूखी निगाहें अश्क अब बहाती नहीं है।

संग दिल से दिल मेरा संगदिल हो गया,
कोई गम भी मुझे अब रुलाती नहीं है।

देवेश साखरे ‘देव’


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8 Comments

  1. राम नरेशपुरवाला - September 17, 2019, 9:47 pm

    क्या खूब लिखा h

  2. Poonam singh - September 17, 2019, 10:06 pm

    Bahut khub

  3. महेश गुप्ता जौनपुरी - September 17, 2019, 11:44 pm

    वाह बहुत सुन्दर

  4. Abhishek kumar - December 25, 2019, 9:58 pm

    Nice

  5. Satish Pandey - July 13, 2020, 6:56 pm

    अति सुन्दर

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