तिमिर बढ़ती जा रही

अवसाद के बादल घिरे
पर तुम न आये प्रिये
यह तिमिर बढ़ती जा रही
बुझे हर उजास के दिये ।
आक्रोश है या ग्लानि इसे नाम दू
कैसे खुद ही मौत का दामन थाम लूँ
मकबूल नहीं यह शर्त हमको
कयी मुमानियत जो हैं दिये ।


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9 Comments

  1. Pragya Shukla - December 6, 2020, 10:56 pm

    सुंदर तथा हृदयविदारक पंक्तियां

  2. Piyush Joshi - December 7, 2020, 7:48 am

    बहुत अच्छी कविता

  3. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - December 7, 2020, 10:26 am

    बेहतरीन

  4. Geeta kumari - December 7, 2020, 2:11 pm

    ह्रदय स्पर्शी रचना

  5. Satish Pandey - December 7, 2020, 10:52 pm

    बहुत खूब

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