तेरी रजधूल ओ प्रियतम!

तुम्हारी राह देखकर ही तो मैं टूट गई
हर रिश्ते से ऊपर था तू
तेरे इश्क में मैं मगरूर हुई
तेरे इश्क का चंदन घिसकर
अंग प्रफुल्लित हुए सदा
तेरी रजधूल ओ प्रियतम! मेरे
मेरी माँग का सिन्दूर हुई।
बूंद-बूंद कर मैनें तेरे प्रेम का
रसपान किया
तेरे नाम से ही मैनें
नवजीवन का निर्माण किया।
तेरी स्मृतियों के आगे मैं तो
खुद को भी भूल गई।
फिर क्यों छोड़ा दामन तुमने
आखिर मुझसे क्या खता हुई?
तेरे वियोग में ओ प्रियतम!
यह प्रज्ञा!
कल पुष्प-सी थी अब शूल हुई।।

Published in हिन्दी-उर्दू कविता

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Responses

  1. सहज सुन्दर शब्दकोश
    आपने प्यार का कोना कोना झाँक लिया है इस कविता में।
    awesome poetry

  2. अच्छे शब्द प्रयोग के साथ
    प्रेम की पराकाष्ठा को दर्शाती रचना
    आपकी लेखनी मे मेैजिक है
    जो सब पर चलता है

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