दरिंदगी

कितने दरिंदगी के हाँथ है इस दुनिया में,
कि अब इंसानियत का चेहरा शर्म से लाल है।
और उस बच्ची का जिस्म खून से बदहाल है।
दिल में ख्वाब थे,कन्धों पर किताबों का बोझ ,
चली जा रही थी स्कूल अपनी तकदीर लिखने ,
बड़ी मासूम थी उस बच्ची की सोच।
पीछे आहट थी कुछ काले क़दमों की,
और वो ही शुरुआत थी इन गहरे जख्मों की।
वो दिल्ली की मोमबत्ती पिघल कर ,
बेह गयी है इस दरिंदगी के दरिये में।
वो शख्स नहीं मर्द है,जो देता ऐसे दर्द है,
जिसका इस दुनिया में न कोई मर्ज़ है।
इस बार वो नादान आबरू नहीं,
मर्दानगी शर्मसार होगी।
अब वो नादान इज़्ज़त नहीं,
मर्दानगी की परिभाषा लूटेगी।
हिन्दू हो या हो मुसलमान ,
हर एक होता है इस देश की जान,
उनके जिस्म को नोच कर ,
हज़ारों की रूह को रुलाया है तुमने।
अपने ही आप को अपनी मां बहन की नज़रों में,
गिराया है तुमने।
ना जाने कितनी आँखों के काजल को फैलाया है तुमने।
आँखों की बारिश को जगाया है तुमने ।
और इसी बारिश की बाढ़ से अब तुम्हारा अंत होगा,
पर याद रखना इस पवित्र मिटटी से न तुम्हारा कभी मिलन होगा।
तुम दरिंदों की मौत तो इन आँखों की आग से ही हो जायेगी ।
मगर तुम्हारी औकात नहीं की हमारी आँखों में सर उठा कर देख लो।

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