दर्जी

कविता- दर्जी
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फटी पैंट मेरी,
ले दर्जी जी के घर जाता हूं,
टूटी फूटी मशीन के संग,
बैठा बुजुर्ग दर्जी हैं,
देख मुझे मुस्कुराया वह,
ढलती शाम तक में जो,
20 रुपए कमाया वह,
कारण पूछा हंसने का,
खुदा को दिल से धन्यवाद दिया,
पहला ग्राहक दुकान पर आने का,
बस एक हुनर था दर्जी में,
बाकी अब उसमें सब कमियां थी,
सुनो……
चश्मा उसका टूटा था,
फटा कुर्ता उसका था,
पके बाल,
पिचके गाल,
दांत भी सारा टूटा था,
संभल रहा ना,
हाथ में कैची
दृष्टि भी कमजोर थी यारों,
सुई धागे का
मेल समझ में
ना आता था,
नाखून बड़े ,
दाढ़ी बाल,
मूंछ बड़े थे,
सर्दी खांसी से,
ख़ास हाफ रहा था,
चार चार हैं,
बच्चे उसके,
बच्चों के बच्चे हैं,
सब के सब अच्छे हैं,
दुख होता हैं,
देख दशा दर्जी का,
क्रोध मुझे आया,
सुन शौक दर्जी के बच्चों का,
चड्डी गंजी,
हर वस्त्र सिला, सारी उम्र बच्चों का,
रोता हैं अपनी हालत पर,
हुनर हैं पर ताकत ना,
बच्चे हैं पर बच्चों को लगता अब,
बाप को अब उन्हें जरूरत ना ,
फटे पुराने कुर्ता में,
सड़क किनारे छप्पर में,
गर्मी वर्षा, ओला पाला सहता,
डांट भी सुनता ग्राहक का,
इसलिए सब कुछ सहता हैं,
दो वक्त की ,रोटी के लिए मरता हैं,
शर्म करो चार चार बच्चों तुम,
क्या तुमको अर्थी में,
कंधा देने के लिए जनमाया है,
उपकार करो ,
धर्म करो,
जीवन में,
संघर्ष करो,
जन्नत पाने के लिए यारों,
मात पिता की सेवा करो,
कहे ‘ऋषि’…
मात पिता के चरणो में,
जिन बच्चों का हाथ माथ रहेगा,
मात-पिता घर के बड़े बुजुर्गों का,
जिस बच्चे के सर पर हाथ रहेगा,
दुनिया का हर सुख पाए,
दिन प्रतिदिन उन्नत करता जाए,
देवलोक में,
देवताओं के श्री चरणों में
निश्चित वह स्थान को पाए,
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**✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’—

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Responses

  1. निर्धन दर्जी की व्यथा का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत किया हैआपने अपनी कविता में। माता पिता , बड़े बुजुर्गों के सम्मान हेतु प्रेरणा देती हुई उत्तम प्रस्तुति

  2. मां बाप का प्रेम निश्छल होता है और
    संतान यह नहीं समझती…
    आपने दर्जी के माध्यम से यही समझाने का प्रयास किया है

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