दहेज़

उम्र भर पिता ने जो, पाई पाई रखा था सहेज।
बिटिया के ब्याह में, आज वह दे दिया दहेज।।

ब्याह में लिए कर्ज का चुका रहे अभी किस्तें।
थमा दिया जाता मांगों के फिर नए फेहरिस्ते।
भीख के दहेज से क्या सारी जिंदगी गुजार लेंगे,
दूषित सोच को हक नहीं, बनाने के नए रिश्ते।
ब्याह कोई व्यवसाय नहीं, दो परिवारों का संबंध है,
मां बाप भी आंखें बंद कर, बिटिया को ना दें भेज।
उम्र भर पिता ने जो, पाई पाई रखा था सहेज।
बिटिया के ब्याह में, आज वह दे दिया दहेज।।

बेटी को धन के लोभियों के घर दिया।
जालिमों ने आंखों में खून के आंसू भर दिया।
कलेजे का टुकड़ा क्या दिल पर इतनी बोझ थी,
अपने ही हाथों कलेजे को टुकड़े टुकड़े कर दिया।
फूलों की नजाकत से पाला जिसे पलकों पे बिठाकर,
कैसे चुना बिटिया के लिए कांटो भरा सेज।
उम्र भर पिता ने जो, पाई पाई रखा था सहेज।
बिटिया के ब्याह में, आज वह दे दिया दहेज।।

बेटी से बढ़कर दूजा और कोई धन नहीं।
समझ लें लोग तो जलेगी कोई दुल्हन नहीं।
सब कुछ छोड़ अपना, एक डोर से बंधी आती,
बहु को बेटी मानें, उससे सुंदर कोई जेहन नहीं।
हाथ जोड़ इस समाज से विनती करता है ‘देव’,
दहेज रूपी नासूर कुप्रथा से हम करें परहेज।
उम्र भर पिता ने जो, पाई पाई रखा था सहेज।
बिटिया के ब्याह में, आज वह दे दिया दहेज।।

देवेश साखरे ‘देव’

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