“दिल का बोझ”

दिल पर एक बोझ लिये घूमती हूँ
ना जाने कहाँ रहती हूँ
क्या सोंचती हूँ
दिल की बेचैनी और बढ़ जाती है
जब तेरे करीब से गुजरती हूँ
तुम्हें हो ना हो मेरी जरूरत
पर मैं तो तुझे ही खुदा समझती हूँ
हर दुआ में मांग लेती हूँ तुझको
मैं तेरे ही ख्वाब देखती हूँ


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5 Comments

  1. vivek singhal - October 18, 2020, 7:42 pm

    क्या बात है प्रज्ञा जी इतनी लाजवाब रचना बहुत खूब

  2. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - October 18, 2020, 8:23 pm

    अतिसुंदर

  3. Rj sid - October 18, 2020, 8:55 pm

    Beautiful line

  4. Geeta kumari - October 18, 2020, 9:01 pm

    अति सुन्दर भाव एवम् सुन्दर प्रस्तुति

  5. Satish Pandey - October 18, 2020, 9:33 pm

    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

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