दीप आश की

कुछ खो सा गया था
इक दूरी जब बन सी गयी थी
पुनः खुद को समेटा
टूटकर बिखर सी गयी थी।
फिर से आपने
जो हौसला बढाया
निखरने की कोशिश में
क़दम मैने बढाया
यह कोशिश कामयाब होगी
उत्साहीन सी हो मैं गयीं थीं ।
एक मंच यह ऐसा मिला है
जहाँ अनजानों से हौसला बढ़ा है
फिर से अनजान रिश्ता बना है
ना शिकवा यहाँ न कोई गिला है
यह सफ़र हमारा ऐसे ही का चलता रहे
आप के सानिध्य में फूलता- फलता रहे
दीप आश की, दिख रही, जो बुझ सी गयी थी।

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Responses

  1. बहुत सुंदर भाव और सुन्दर रचना है सुमन जी ।बिल्कुल ये मंच एक परिवार जैसा ही है। जहां अनजाने भी पहचाने से हो जाते हैं।

  2. मैं जानती हूं सुमन जी
    हर कवि के जीवन में एक खालीपन होता है
    उस खालीपन में अनगिनत दर्द होते हैं जो कवि को संवेदनशील बनाते हैं
    लेकिन यह संवेदनशीलता एक आम इंसान को कमजोर बना सकती है पर कवि के लिए यह वरदान सिद्ध होती हैं हम अनजान नहीं अपने ही हैं आपको आपकी कविताओं से जान वा समझ चुके हैं..

      1. मेरे पास शब्द नहीं ।
        पर यह मंच, आप सबो का साथ, अच्छे कर्मों की निशानी है ।

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