दीप आश की

कुछ खो सा गया था
इक दूरी जब बन सी गयी थी
पुनः खुद को समेटा
टूटकर बिखर सी गयी थी।
फिर से आपने
जो हौसला बढाया
निखरने की कोशिश में
क़दम मैने बढाया
यह कोशिश कामयाब होगी
उत्साहीन सी हो मैं गयीं थीं ।
एक मंच यह ऐसा मिला है
जहाँ अनजानों से हौसला बढ़ा है
फिर से अनजान रिश्ता बना है
ना शिकवा यहाँ न कोई गिला है
यह सफ़र हमारा ऐसे ही का चलता रहे
आप के सानिध्य में फूलता- फलता रहे
दीप आश की, दिख रही, जो बुझ सी गयी थी।


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12 Comments

  1. Pragya Shukla - December 27, 2020, 7:26 pm

    बहुत ही सुंदर भाव लिए हुए सुंदर शिल्प से सजी बेहतरीन रचना

  2. Geeta kumari - December 27, 2020, 7:29 pm

    बहुत सुंदर भाव और सुन्दर रचना है सुमन जी ।बिल्कुल ये मंच एक परिवार जैसा ही है। जहां अनजाने भी पहचाने से हो जाते हैं।

  3. Pragya Shukla - December 27, 2020, 7:50 pm

    मैं जानती हूं सुमन जी
    हर कवि के जीवन में एक खालीपन होता है
    उस खालीपन में अनगिनत दर्द होते हैं जो कवि को संवेदनशील बनाते हैं
    लेकिन यह संवेदनशीलता एक आम इंसान को कमजोर बना सकती है पर कवि के लिए यह वरदान सिद्ध होती हैं हम अनजान नहीं अपने ही हैं आपको आपकी कविताओं से जान वा समझ चुके हैं..

    • Suman Kumari - December 28, 2020, 11:36 am

      बहुत बहुत धन्यवाद

      • Suman Kumari - December 28, 2020, 11:38 am

        मेरे पास शब्द नहीं ।
        पर यह मंच, आप सबो का साथ, अच्छे कर्मों की निशानी है ।

  4. Rishi Kumar - December 27, 2020, 8:02 pm

    अत्यंत सुंदर रचना

  5. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - December 27, 2020, 9:12 pm

    अतिसुंदर

  6. Sandeep Kala - December 27, 2020, 9:23 pm

    अत्यन्त सुन्दर भाव

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