दुर्गा भाभी-01

उम्मीद की लौ जल-जल के बुझ रही थी
नाउम्मीदी के तिमिर में, हर साँस जल रही थी
परालम्बन भरे जीवन से मुक्ति हमें दिलाने
वीर- वीरान्गनाओ की टोली कफ़न बाँध चल रही थी ।।
दिन के उजाले में भी, तमस से हम घिरे थे
खुद के ही घरों में, हम बंधक बन रह गये थे
तब दुर्गा रूपी पुष्प, कौशांबी में, खिल रही थी
नाउम्मीदी के तिमिर में, हर साँस जल रही थी —-
“हिंद की अग्नि” से थी जो विभूषित
वीरता से अपनी, ब्रिटिशों को थर्राने वाली
पराधीनता के प्रारब्ध से मुक्ति दिलाने चल रही थी
नाउम्मीदी के तिमिर में, हर साँस जल रही थी—-
सहधर्मिणी वोहरा की, क्रांति का व्रत लिया था
पग-पग पर, दुर्गा ने, साथ-साथ चल लिया था
“इरविन” को बम से उङाने की नीति बना रही थी
नाउम्मीदी के तिमिर में, हर साँस जल रही थी—-
गहनों की लालसा, हम महिलाओं की है पुरानी
सौभाग्यचिन्ह आभूषणों को भेंट चढाने वाली
पति को भी गंवा के, पराभव न मान ,वो रही थी
नाउम्मीदी के तिमिर में, हर साँस जल रही थी–
पिस्तौलबाजी में , महारत उन्हें हासिल थी
बम बनाने की कला में भी निपुणता लिए थी
गृहिणी होकर भी क्रांति की अलख जगा रही थी
नाउम्मीदी के तिमिर में, हर साँस जल रही थी—-
अनगिनत वर्ज़नाओ की बंदिशो में, नारी जकङी हुई थी
क्रांति की अलख जगाने,धधकती विद्रोह में कुद पङीथी
मुखबिर, कभी भार्या बन, वतन का कर्ज चुका रही थी
नाउम्मीदी के तिमिर में, हर साँस जल रही थी—-

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