देश दुर्दशा वर्णन ।।

निज राष्ट्र की दुर्दशा अब कोई क्यूँ कहता नहीं? भारतेन्दु हरिश्चन्द्रजी कह गये भारत दुर्दशा,
अब कोई कवि महाराज जी ऐसी कविता क्यूँ लिखते नहीं?
अंग्रेजों ने हमारी मान-सम्मान व सारी मर्यादा को मिट्टी में मिला दी ।
देश की सारी-की-सारी सुव्यवस्था को कुव्यवस्था में तब्दील कर दी ।
यह क्रूर निर्दयी हिंसक पशु अत्याचारी, यह दुष्ट स्वभाव मानव कलंगी ।
इस बात से हैं हम सब वाकिफ़, फिर भी आज हम क्यूँ अपनाते इनकी कुनीति?
अब तो छोड़ो भारतवासी कुनीति स्वदेशी अपनाकर कल्याण करो निज राष्ट्र की ।
निज भाषा में ही उत्थान होती राष्ट्र की ये बात है ग्यान-विग्यान की ।
कुछ तो समझो निज राष्ट्र की स्थिति और कल्याण करो निज धरा की ।
भारत हो कुछ तो भारतीयता का लाज रखो सम्मान करो निज धरा की ।
निज राष्ट्र में रहतो हो परराष्ट्र के वस्त्र पहनते, भाषा बोलते व खाते चीज परदेशों की ।
तो कैसे बढेंगी निज राष्ट्र की सकल घरेलु उत्पाद जो अपनी वस्तु को ही धिक्कारते हो ।
कुछ तो समझो परराष्ट्र की राजनीति जो तुम्हें अपने सामानों के प्रति आकर्षित करती है ।
तेरे पास भी तो हैं तो काबिलीयत कुछ ऐसा करके दिखाओ तुम ।।
हर वह वस्तु बनाओ तुम जो तेरे देशवासी को भाता है ।
इस तरह कल्याण होगा निज राष्ट्र की और होगी राष्ट्र की उन्नति ।
निज राष्ट्र की मिट्टी का सम्मान करो यहीं तुम्हें भायेगा, परराष्ट्र की चकाचौंध में तेरी आँखें नहीं चौंधयायेंगी ।
अगर तुम्हें निज राष्ट्र से प्रेम होगा तो तुम्हें निज राष्ट्र को उच्च शिखर पर पहुँचाओं ।
ऐसा करोगे तुम तुम्हारे कीर्ति जहां तेरे बाद जाने दुहरायेगी ।।
निज राष्ट्र की दुर्दशा अब कोई क्यूँ कहता नहीं ।।

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