दोहे

गरीब गरीब रह गया, सेठ सौ गुना सेठ।
खाई सा अंतर हुआ, भूख बराबर पेट।।1
गरीबों के उत्थान की, बनी योजना लाख।
कागज में पूरी हुई, उस तक पंहुची खाक।।2
—– सतीश पाण्डेय

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Responses

  1. सुंदर दोहे, सावन और कवि को इन पंक्तियों के लिए धन्यवाद

  2. वाह, वास्तव में गरीबों के लिए बनी योजनाएं उन तक पहुँचने से पहले ही पूरी हो जाती हैं,

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