“दो मुट्ठी आसमां”

तमाम ख्वाहिशें नहीं हैं मेरी
बस ‘दो मुट्ठी आसमां’ की ख्वाहिश है
पंख हों उड़ने का हौसला हो
और हों बेहिसाब मंजिलें
उड़ चलूं जिसमें मैं अकेली
ना हो कोई मुश्किलें..
चाहें जिस राह पर चलूं मैं
मगर सफर कभी खत्म ना हो
आसमान में चाँद-सितारे हों रौशन
नाकामयाबी का धुंधलापन ना हो….


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7 Comments

  1. Geeta kumari - October 19, 2020, 9:07 pm

    बहुत ख़ूब बहुत सुंदर कविता

  2. Satish Pandey - October 19, 2020, 9:19 pm

    बहुत खूब, लाजवाब

  3. neelam singh - October 20, 2020, 10:42 am

    आसमां की ख्वाहिश..
    उम्दा रचना

  4. jeet rastogi - October 20, 2020, 1:37 pm

    सुंदर अभिव्यक्ति ऐसे ही अच्छा अच्छा लिखती रहिए

  5. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - October 20, 2020, 11:29 pm

    बेहतरीन

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