दो रूप न दिख पाऊँ

हाथी की तरह
दो दांत मत देना मुझे प्रभो
कि बाहर अलग, भीतर अलग।
दो रूप न दिख पाऊँ।
दो राह न चल पाऊँ।
जैसा भी दिखूँ
एक दिखूँ,
नेक रहूँ।
न किसी से ठेस लूँ,
न किसी को ठेस दूँ।
बिंदास गति में बहती
नदी सा
चलता रहूँ।
हों अच्छे काम मुझसे,
उल्टा न चलूँ
सुल्टा रहूँ,
धूप हो या बरसात हो,
उगता रहूँ,
फूल बनकर
बगीचे में खिलता रहूँ।
महक बिखेरता रहूँ,
प्रेम सहेजता रहूँ।


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7 Comments

  1. Devi Kamla - April 8, 2021, 10:13 pm

    बहुत सुंदर रचना

  2. Pragya Shukla - April 8, 2021, 10:54 pm

    Very nice

  3. Rishi Kumar - April 9, 2021, 5:21 am

    बहुत सुंदर

  4. Deepa Sharma - April 9, 2021, 12:53 pm

    बगीचे में खिलता रहूँ।
    महक बिखेरता रहूँ,
    प्रेम सहेजता रहूँ।
    *****
    कवि सतीश पाण्डेय जी की अति सुंदर और शानदार कविता

  5. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - April 9, 2021, 3:08 pm

    अतिसुंदर भाव

  6. Geeta kumari - April 9, 2021, 3:17 pm

    जैसा भी दिखूँ
    एक दिखूँ,
    नेक रहूँ।
    न किसी से ठेस लूँ,
    न किसी को ठेस दूँ।
    बिंदास गति में बहती
    नदी सा
    चलता रहूँ।
    _______ नेक रास्ते पर निर्बाध गति से चलने की प्रेरणा देती हुई कवि सतीश जी की अति उत्तम रचना। अति उत्तम अभिव्यक्ति सुंदर शिल्प और श्रेष्ठ लेखन

  7. Arvind Kumar - April 9, 2021, 4:42 pm

    बहुत सुन्दर कविता

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