नयन आपके

नयन आपके राह भटका रहे हैं,
जरा सा चलें तो अटका रहे हैं।
हुआ क्या अचानक उन्हें आज ऐसा
हमें देख जुल्फों को झटका रहे हैं।
इल्जाम हम पर लगाओ न ऐसे,
दिल ए द्वार वे खुद खटका रहे हैं।
दिल टूटने से दुखी हैं बहुत वे
मगर गम नहीं है, जतला रहे हैं।


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7 Comments

  1. Praduman Amit - October 17, 2020, 6:53 pm

    Bahut khoob

  2. Pragya Shukla - October 17, 2020, 7:19 pm

    सुंदर

  3. Piyush Joshi - October 17, 2020, 9:23 pm

    वाह सर बहुत खूब

  4. Suman Kumari - October 17, 2020, 10:43 pm

    सुन्दर

  5. Geeta kumari - October 18, 2020, 5:27 am

    कवि सतीश जी की श्रृंगार रस से परिपूर्ण अति सुंदर रचना ।
    सुन्दर भवाभिव्यकती

  6. Devi Kamla - October 18, 2020, 7:33 am

    वाह जी वाह

  7. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - October 18, 2020, 8:21 pm

    अतिसुंदर

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