नासूर

जख़्म गर नासूर बन जाए, उसे पालना बहुत भारी है।
ज़िन्दगी बचाने के लिए, अंग काटने में समझदारी है।

यह फलसफ़ा असर करता है, हर उस नासूर पर,
चाहे वह शारीरिक हो या फिर सामाजिक बिमारी है।

जहाँ – तहाँ फन उठाए घुम रहे हैं, आस्तीन के साँप,
डसने से पहले ही, जहरीले फन कुचलने की बारी है।

अच्छाई का झूठा नकाब, अब हटने लगा चेहरों से,
जब भी गले लगाया, तुमने पीठ में खंजर उतारी है।

गलत को गलत कहने की हिम्मत नहीं बची हममें,
नज़र अंदाज़ करने की भी, यह कैसी लाचारी है।

शराफ़त को कमजोरी समझने की भूल ना करना,
क्रांति पर यकीं रखते, हम नहीं अहिंसा के पुजारी हैं।

देवेश साखरे ‘देव’


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11 Comments

  1. Shakti Kumar Tripathi - June 7, 2020, 3:45 pm

    Very nice ❤️👌

  2. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - June 7, 2020, 4:46 pm

    बहुत ही सुंदर

  3. Pragya Shukla - June 7, 2020, 6:50 pm

    👌👌👏👏

  4. Aman Kumar Shastri - June 8, 2020, 4:30 pm

    Excellent Shastri ji.

  5. Abhishek kumar - July 12, 2020, 11:55 pm

    👌👌

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