नि:स्वार्थ प्रेम

तुम धरा हो, मैं वृक्ष हूं
तुम चैतन्य हो, मैं प्रेम हूं |

तुम नदिया हो, मैं किनारा हूं
तुम अग्नि हो, मैं हवनकुंड हूं |

तुम जीव हो, मैं श्वास हूं
तुम मर्यादा हो, मैं छैला हूं |

सच कहूं मैं प्रिय तुम्हें तो
मैं हंस, तुम मेरी हंसिनी हो |


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3 Comments

  1. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - January 28, 2021, 7:53 am

    अतिसुंदर भाव

  2. Satish Pandey - January 28, 2021, 8:11 am

    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

  3. Geeta kumari - January 28, 2021, 4:29 pm

    नि:स्वार्थ प्रेम की सुन्दर अभिव्यक्ति

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