*नेत्रदान*

अंधा ना कहो आँखों वालों,
मुझे नेत्रहीन ही रहने दो।
आँख नहीं ग़म का सागर है,
कुछ खारा पानी बहने दो।
तुम क्या समझो आँखों का न होना,
एक छड़ी सहारे चलता हूं।
अपने ही ग़मों की अग्नि में,
मैं अपने आप ही जलता हूं।
कभी सड़क पार करवा दे कोई,
मैं उसे दुआएं देता हूं।
देख नहीं पाता हूं बेशक,
महसूस सदा ही करता हूं।
यह दुनिया कितनी सुंदर होगी,
चाँद, सितारे सूरज इनके बारे में सुनता हूं।
कभी देख पाऊं इनको मैं,
ऐसे ख्वाब भी बुनता हूं।
सुना है करने से नेत्र दान,
दुनियां देख सके एक नेत्रहीन।
क्या तुम भी करोगे नेत्रदान
मैं भी देख सकूं इस संसार को,
दूंगा ढेरों दुआएं तुम्हें
और तुम्हारे परिवार को।।
____✍️गीता


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10 Comments

  1. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - February 20, 2021, 7:47 pm

    बहुत सुंदर

  2. Piyush Joshi - February 20, 2021, 8:03 pm

    बहुत सुंदर रचना

  3. Vanshika Yadav - February 20, 2021, 9:14 pm

    वाह क्या खूब

  4. Rakesh Saxena - February 20, 2021, 11:55 pm

    नेत्रदान महादान 🙏 वाह, बहुत सुंदर

  5. Satish Pandey - February 22, 2021, 2:55 pm

    अंधा ना कहो आँखों वालों,
    मुझे नेत्रहीन ही रहने दो।
    आँख नहीं ग़म का सागर है,
    कुछ खारा पानी बहने दो।
    —- वाह, जीवन से जुड़ी बेहतरीन कविता की सृष्टि की है आपने। बहुत खूब, एक श्रेष्ठ रचना।

    • Geeta kumari - February 22, 2021, 6:13 pm

      आपकी समीक्षा शक्ति को अभिनंदन सतीश जी, बहुत-बहुत धन्यवाद

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