पत्थर से पंगा मत लेना

दोष नहीं दर्पण का थोड़ा
सदा सत्य दिखलाता है।
कपटी क्रूर कपूत घमण्डी
दर्पण को दोषी कहता है।।
सत्य असत्य के चक्कर में
पत्थर से पंगा मत लेना।
देख ‘विनयचंद ‘सीसा हो तुम
इसको मत भुला देना।।


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8 Comments

  1. MS Lohaghat - August 9, 2020, 7:54 am

    बहुत अच्छी
    सादर धन्यवाद
    सुन्दर कविता

  2. Satish Pandey - August 9, 2020, 8:02 am

    अति सुंदर

  3. Geeta kumari - August 9, 2020, 8:21 am

    मनुष्य को सत्य ,असत्य के बारे में भान कराती सुंदर रचना।

  4. Vasundra singh - August 9, 2020, 11:46 am

    सुन्दर

  5. Ambuj Singh - August 9, 2020, 1:46 pm

    बहुत अच्छी कविता

  6. Rishi Kumar - August 9, 2020, 4:41 pm

    👌✍🙏

  7. Prayag Dharmani - August 13, 2020, 2:22 pm

    Nice Poetry

  8. Kundan Mishra - August 15, 2020, 4:48 pm

    Good

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