“परिपक्व बंधन”

हमारे परिपक्व बंधन पर था
घोर अंधेरा छाया
एक भंवरे ने आकर के
तेरा हाल बताया
तेरी बेचैनी पर मेरी आँख
भर आई
तेरी नादानी पर मुझको
हँसी खूब है आई
ये कैसा अल्हण पन है ?
यह फागुन का मौसम है
आ बाँहों में तू आ जा
यह मन अब भी पावन है
है तूने दूरी बनाई
है पास तुझे ही आना
एक वादा अब कर देना
फिर दूर कभी ना जाना….


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16 Comments

  1. Geeta kumari - April 6, 2021, 8:13 am

    हमारे परिपक्व बंधन पर था
    घोर अंधेरा छाया
    एक भंवरे ने आकर के
    तेरा हाल बताया
    ह्रदय की व्यथा बयान करती हुई कवि प्रज्ञा जी की बहुत ही मार्मिक अभिव्यक्ति

  2. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - April 6, 2021, 8:15 am

    बहुत खूब

  3. vivek singhal - April 6, 2021, 10:58 am

    हमारे परिपक्व बंधन पर था
    घोर अंधेरा छाया
    एक भंवरे ने आकर के
    तेरा हाल बताया
    तेरी बेचैनी पर मेरी आँख
    भर आई
    तेरी नादानी पर मुझको
    हँसी खूब है आई
    ये कैसा अल्हण पन है ?

    दो तरफा प्रेम में हुई नोंक झोंक को व्यक्त करती हुई सुंदर रचना

  4. Rj sid - April 6, 2021, 11:21 am

    Beautiful creation defines relationships
    You are an emotional poet, understand the nuances of Relationship…

  5. neelam singh - April 6, 2021, 11:27 am

    किसी से नाराजगी व्यक्त करती तथा उसे याद करती हुई रचना

  6. Rishi Kumar - April 6, 2021, 4:16 pm

    अत्यंत सुंदर रचना

  7. jeet rastogi - April 6, 2021, 9:06 pm

    कमाल की कविता है
    नमन है आपकी लेखनी को
    १०० टका सच कहा

  8. Ajay Shukla - April 9, 2021, 9:58 am

    बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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