पहचान

जात-पात के बन्धन में एक पुतला बनकर इतराता है,

क्यों छोटी छोटी बातों पर ही तू अपनों को ठुकराता है,

एक माँ की सन्तान है पर क्यों अलग-थलग मंडराता है,

अपने ही घर में तू कैसे अपनों को हाथ लगाता है,

नारी जाति सम्मान ही क्यों पैरों से कुचला जाता है,

रिश्तों के चिथड़े अखबारों में क्यों खुले आम छपवाता है,

संस्कारों की प्रकृति विशेष का क्यों दम भरकर दिखलाता है,

जब अपनी ही प्रवर्ति से तू अपनी पहचान बनाता है,

जब नग्न यहाँ कोई आता है और नग्न यहाँ से जाता है,

फिर क्यों अपनी माँ के माथे पर अपमान का तिलक लगाता है।।
राही (अंजाना)

Related Articles

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-34

जो तुम चिर प्रतीक्षित  सहचर  मैं ये ज्ञात कराता हूँ, हर्ष  तुम्हे  होगा  निश्चय  ही प्रियकर  बात बताता हूँ। तुमसे  पहले तेरे शत्रु का शीश विच्छेदन कर धड़ से, कटे मुंड अर्पित करता…

प्यार अंधा होता है (Love Is Blind) सत्य पर आधारित Full Story

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ Anu Mehta’s Dairy About me परिचय (Introduction) नमस्‍कार दोस्‍तो, मेरा नाम अनु मेहता है। मैं…

Responses

New Report

Close