पूस की रात

पूस की रात मे
दुनिया देख रही थी सपने
आलस फैला था चहु ओर
रात भी लगी थी ऊँघने.

मैंने छत्त से देखा
बतखों के झुण्ड को तलाब मे
तीर सी ठण्डी हवा चलने लगी थी
रात के आखरी पहर मे.

मछलिया खूब उछल रही थी
तेर रही थी इधर -उधर
सोचा हाथ लगाउ उनको
पर ना जाने छुप गई किधर.

तभी कुछ शोर सुनाई दिया आसमान मे
बागुले उड़ रहे थे एक पंक्ति मे
जैसे वो सब आजाद है
मेने भी खुद को आजाद महसूस किया उनकी
स्वछंद संगती मे.
….. राम नरेश…..


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पूस की रात।

16 Comments

  1. Abhishek kumar - December 18, 2019, 9:50 am

    Good

  2. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - December 18, 2019, 11:49 am

    सुंंदर

  3. Amod Kumar Ray - December 18, 2019, 5:48 pm

    Good

  4. Pragya Shukla - December 18, 2019, 7:19 pm

    सही है

  5. nitu kandera - December 19, 2019, 6:11 am

    Wah

  6. Kandera - December 19, 2019, 6:15 am

    Good

  7. Kandera Fitness - December 19, 2019, 6:18 am

    Wah

  8. kandera study - December 19, 2019, 6:19 am

    Cool

  9. sudesh ronjhwal - December 19, 2019, 6:21 am

    Wah

  10. D.K jake gamer - December 19, 2019, 6:23 am

    Good

  11. Sudesh Ronjhwal - December 19, 2019, 6:25 am

    Wah

  12. Ishwari Ronjhwal - December 19, 2019, 3:40 pm

    Wah

  13. sandhya Singh - December 19, 2019, 9:38 pm

    Nice

  14. Pragya Shukla - February 29, 2020, 11:10 pm

    Nice

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