पूस की रात

पूस की रात
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कड़कड़ाती सर्दी,सिसकती सी रात
ठिठुरन, सिहरन आरंपार।
पूस की रात जो हुई बरसात
कांप उठी सारी कायनात।
ना जाने कब
होगी ये प्रातः।

ठंड और कोहरे ने
गला दिए हाड़ मांस।
खून जम चुका है
प्रभु से लगी है आस।
कांप रहे जन
जिनका नहीं है बसेरा कही।
शीत से बचने को
चिथडो में
लिपटे कुछ प्राण है।

शीत का प्रकोप जारी
ठंड है या कोई महामारी
जान पे बनी है
कायनात पर पड़ी हैं भारी।

एक तरफ जश्न है
लोग सब मगन है
एक तरफ कफ़न है
इस ठंड में भी नग्न है।

दीनो को संभालो प्रभु
देवदूतों को उतारो प्रभु
सड़के बनी शमशान
अब तो देदो प्राण दान प्रभु।

चक्र को घुमाओ प्रभु
संकट मिटाओ प्रभु
द्रोपदी की साड़ी सा
कंबल बन जाओ प्रभु।

रक्षक तो थे ही
रक्षाकवच बन जाओ प्रभु।

निमिषा सिंघल

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